(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    


॥ श्रीः ॥
9.28. अध्यायः 028
Mahabharata - Shalya Parva - Chapter Topics
हतावशिष्टे बले पाण्डवैर्निहते दुर्योधनेन पलायने निर्धारणम्॥ 1 ॥


Mahabharata - Shalya Parva - Chapter Text

स़ञ्जय उवाच। 9-28-0x(5126)(61689)
ततः क्रुद्धा महाराज सौबलस्य पदानुगाः।
त्यक्त्वा जीवितमाक्रन्दे पाण्डवान्पर्यवारयन्॥ 9-28-1(61690)
तानर्जुनः प्रत्यगृह्णात्सहदेवजये धृतः।
भीमसेनश्च तेजस्वी क्रुद्धाशीविषदर्शनः॥ 9-28-2(61691)
शक्त्यृ-ष्टिप्रासहस्तानां सहदेवं जिघांसताम्।
सङ्कल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनञ्जयः॥ 9-28-3(61692)
सङ्गृहीतायुधान्बाहून्योधानामभिधावताम्।
भल्लैश्चिच्छेद बीभत्सुः शिरांस्यपि हयानपि॥ 9-28-4(61693)
ते हयाः प्रत्यपद्यन्त वसुधां विगतासवः।
चरता लोकवीरेण प्रहताः सव्यसाचिना॥ 9-28-5(61694)
ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा स्वबलसङ्क्षयम्।
हतशेषान्समानीय क्रुद्धो रथगणान्बहून्॥ 9-28-6(61695)
कुञ्जरांश्च हयांश्चैव पादातांश्च समन्ततः।
उवाच दुःखितान्सर्वान्धार्तराष्ट्र इदं वचः॥ 9-28-7(61696)
समासाद्य रणे सर्वान्पाण्डवान्ससुहृद्गणान्।
पाञ्चाल्यं चापि सबलं हत्वा शीघ्रं न्यवर्तत॥ 9-28-8(61697)
तस्य ते शिरसा गृह्य वचनं युद्धदुर्मदाः।
अभ्युद्ययू रणे पार्थांस्तव पुत्रस्य शासनात्॥ 9-28-9(61698)
तानभ्यापततः शीघ्रं हतशेषान्महारणे।
शरैराशीविषाकारैः पाण्डवाः समवाकिरन्॥ 9-28-10(61699)
तत्सैन्यं भरतश्रेष्ठ मुहूर्तेन महात्मभिः।
अवध्यत रणं प्राप्य त्रातारं नाभ्यविन्दत॥ 9-28-11(61700)
पलायमानं तु भयान्नावतिष्ठति दंशितम्।
अश्वैर्विपरिधावद्भिः सैन्येन रजसा वृते॥ 9-28-12(61701)
न प्राज्ञायन्त समरे दिशः सप्रदिशस्तथा।
ततस्तु पाण्डवानीकान्निःसृत्य बहवो जनाः॥ 9-28-13(61702)
अभ्यघ्नंस्तावकान्युद्धे मुहूर्तादिव भारत।
ततो निःशेषमभवत्तत्सन्यं तव भारत॥ 9-28-14(61703)
अक्षौहिण्यः समेतास्तु तव पुत्रस्य भारत।
एकादश हता युद्धे ताः प्रभो पाण्डुसृञ्जयैः॥ 9-28-15(61704)
तेषु राजसहस्रेषु तावकेषु महात्मसु।
एको दुर्योधनो राजन्नदृश्यत भृशं क्षतः॥ 9-28-16(61705)
ततो वीक्ष्य दिशः सर्वा दृष्ट्वा शून्यां च मेदिनीम्।
विहीनः सर्वयोधैश्च पाण्डवान्वीक्ष्यं संयुगे॥ 9-28-17(61706)
मुदितान्सर्वतः सिद्धान्नर्दमानान्समन्ततः।
बाणशब्दरवांश्चैव श्रुत्वा तेषां महात्मनाम्॥ 9-28-18(61707)
दुर्योधनो महाराज कश्मलेनाभिसंवृतः।
अपयो मनश्चक्रे विहीनबलवाहनः॥ ॥ 9-28-19(61708)

इति श्रीमन्महाभारते शल्यपर्वणि ह्रदप्रवेशपर्वणि अष्टादशदिवसयुद्धे अष्टाविंशोऽध्यायः॥ 28 ॥


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